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माखनलाल चतुर्वेदी जी की इस कविता को पढ़कर किसके अंदर स्वदेश प्रेम नहीं जागेगा ?

by Admin | Posted: Jun 08, 2018 at 18:50 | Views: 1619

माखनलाल चतुर्वेदी जी की इस कविता को पढ़कर किसके अंदर स्वदेश प्रेम नहीं जागेगा ?

कविताओं की दुनियाँ में आज पढ़िए माखनलाल चतुर्वेदी को ...

पुष्प की अभिलाषा 

चाह नहीं, मैं सुरबाला के 

गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,

मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

Source : Google




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