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आज पढ़िए एक खूबसूरत प्रेम कहानी - सड़क (अंतिम भाग)

by Admin | Updated: Jan 30, 2019 at 16:42 | Views: 705

आज पढ़िए एक खूबसूरत प्रेम कहानी - सड़क (अंतिम भाग)

सड़क कहानी का आख़िरी और अंतिम भाग




सड़क (अंतिम भाग)

अगले दिन सुबह आठ बजे का वक़्त...

एक कंक्रीट वाली छत जो आधी सूखी है आधी गीलीवहीँ पर कैप्सटन की तीन डिब्बियां पड़ी हैंआस पास कम से बीस पच्चीस सिगरेट बट!

अबे आशू साले पागल हो गए हो क्यासाले यहाँ कहाँ चढ़ गएघर में बवाल हो गया हैसब ढूंढ रहे हैंये सारी सिगरेट तुम पिए होआंटी सोच रही है कि तुमशुक्लाइन की लड़की के साथ भाग गए हो!” सिद्धू ने पेट पकड़ कर हाँफते हुए बोलापचास फीट ऊंची टंकी चढ़तेचढ़ते सिद्धू के प्राण मुंह के रास्ते बाहर रहे थे!

कौन शुक्लाइन बेआशू सूरज की रोशनी में आँखे मीचते हुए बोलाजैसे पता नहीं कितने सालों बाद सोकर उठा हो!

सिद्धू - अबे वही... जिसने तुम्हारे चक्कर में फिनायल पी लिया थाजो आजकल पिंटू मेकेनिक के साथ घूम रही है!

आशूबकचोदी मत करोहुआ क्या?

सिद्धूसाले हम बकचोदी कर रहे हैंकल रात से तुम्हारे घर वाले तुमको ढूंढ रहे हैंतुम्हारे बाप सरऊ हमारे बाप से दंगा करके आये हैं कि हम उनके लौंडेको बियर पीना सिखाये हैंसालेसारे हरामी काम हमको तुम्हारे दिए हुए हैंपहली बार सिगरेट से लेकर गांजा सब तुम सिखायेऔर तुम्हारे बाप हमारे बापको टेलर दे रहे हैंपूरे मोहल्ले में तुम फरार घोषित हो और यहाँ टंकी पर साले पसरे हुए होएक करवट और ले लेते  तो नीचे कुत्ते बिल्ली तुम्हारी खोपड़ी कीचटनी खा रहे होते!

ये सुनते ही आशू की नजर नीचे गईअपनी ऊंचाई का अंदाजा होते ही उसकी सारी नींद हिरन हो गई!

अरे साला!” आशू चौंक गया!

सिद्धू – भूतनी के इतना कोहराम मचा दिए हो और हमको विज्ञान बता रहे होघर चलो आज तुमरे बाप चप्पल समेत खा जायेंगे तुमको और जगह बची पेट मेंतो हमको भी!

आशू हँसने लगा और अपने कपडे झाड़ते हुए बोला... “अबे घुसो बेडर नहीं लगता हमकोअब तो साला दो थप्पड़ एक्स्ट्रा खायेंगे बाप सेतुमको अंदाजा नहींहै सिद्धू हमारे अंदर क्या केमिकल रिएक्शन चल रहा हैहमारा टेस्ट करवा लोकोकेन बह रही है सिद्धू कोकेन... बेच दो बे हमारा सारा खूनभोले नाथ किकसम करोडपति हो जाओगे रे सिद्धू!

ये बोलते बोलते आशू टंकी की रेलिंग पर चढ़ गया!

अरे जय हो सरस्वती मईया कीहम आशुतोष त्रिपाठीपुत्र हरनाम त्रिपाठीगौत्र कश्यपपूरे होशोहवास में कसम खाते हैं कि निराजली व्रत रखेंगे हरसोमवारआज से लेकर जब तक हमारे प्राण चल रहे हैं!”

उस वक़्त आशू आशिकों का भीष्म पितामह लग रहा थादो पैर एक चरमराती रेलिंग परजीवन का कोई मोह नहींहाथ फैलेआसमान से बाते करता हुआ,और चेहरे पर पागलपनप्यारविश्वासउन्माद और हर वो भाव जो किसी भी किताब में कहा नहीं गया!

जहाँ आशू खड़ा था वहां से पूरे का पूरा कस्बा दिख रहा थायूं लग रहा था कि वो छोटा सा क़स्बा साक्षी था इस शपथ काउस इंतज़ार काउस मोहब्बत औरपागलपन काजो कल रात पूरा हुआ है!

सिद्धू- “ अबे सरस्वती जी का सोमवार को नहीं होता है शिव जी का होता हैओये अशुवा मर जाएगा सालेनीचे उतर बक्चोदये रेलिंग पहले से ही हिला हुआहैअरे पगला गया है क्याकहाँ चढ़ गयाअबे हम मर्डर केस में फंस जायेंगे बे!”

आशू ने नीचे देखासिद्धू के ऊपर कूदा... और पानी में फिसलकर बड़ी तेज गिराउसके वजन से पतला दुबला सिद्धू भी गिर गयाउसकी कोहनी काफीछिल गईवो दोनों टंकी के एकदम किनारे पर था जहाँ से मौत सिर्फ कुछ इंच दूर थी... वो सिद्धू को देख कर पागलों कि तरह हंसने लगा और फिर अचानकसे एकदम भारी गले से बोला

अबे सिद्धू वो  गईउसने कहा था वो आएगी

सिद्धूकौन  गई बे?

आशूसिद्धू कभी साँस रोके हो बाल्टी में मुंह डालकेथोड़ी देर में ... सब काला काला लगने लगता है!

सिद्धूये सब बकचोदी करने का टाइम नहीं है हमरे पासजॉइंट फैमिली है और एक ही बाथरूम है!

आशू- “सिद्धू हमारा मुंह साढ़े चार साल से बाल्टी के अंदर था आज बाहर निकला हैहमको साँस लेने दो बे!” वो चिल्लाया!

और ये कहते कहते आशू कि आँखों में पानी उतर आयाफिर वो और भी जोर से चिल्लाया और पागलों कि तरफ हंसने लगा!

रूचि  गईवापसउसने कहा था आएगी!”

आशू खड़ा हुआ और सिद्धू को बहुत जोर से गले लगायापूरी ताकत से!

वो  गईहम सपने में हैं क्या बे?”

अबे मर जायेंगे बे आशूसांस रुक रही है!” सिद्धू दबी आवाज में बोला!

सिद्धू- “अबे साले वो रूचि थी कल रातमतलब...अरे साला!

तो तुम इसीलिए वहां...? अबे बताये काहे नहीं बे?” सिद्धू हैरान होकर बोला!

आशू- “अबे मुंह में ज़बान कहाँ थी बेहम तो थे ही नहीं सड़क परहमको होश ही नहीं थाहमको तो ये भी याद नहीं कि हम यहाँ कैसे आयेऔर क्या हुआउसको देखने के बाद!

हुआ ये सरऊ कि तुम वहां बुत बनके खड़े थे और हम तुम को खींच रहे थेजो किसी भी समझदार दोस्त का फ़र्ज़ होता हैआधा हम भीग चुके थे और येहमारी कुटोंस की नयी कमीज जो हमने कल पहली बार पहनी थी तुम्हारे चक्कर में इसकी सत्या पिट गईसामने से बगल वाले चौरसिया जी  रहे थे इसलिएहम तुमको छोड़कर कट लिए वहां सेअपना गेट फांदे और अपने कमरे में सो गए और फिर सुबह जब आँख खुली तो हमारे बाप जो तुम्हारे हिसाब से आई.सीयूमें थे वो तुम्हारे बाप को आई.सी.यू में ले जाने के लिए बाहें चढ़ाये खड़े थेअगर हम दो मिनट और  उठते तो तुम्हारे बाप हमारे बाप का कॉलर पकड़लेतेऔर आशू एक बात बताएं 

यार हमको अब बहुत डर लग रहा है तुमसेये रूचि के आने के बाद तुम अब हम हमसे क्या क्या करवाओगे इसका अंदाजा खुद तुमको भी नहीं हैहमारादिल बैठ रहा है यारतुम घर चलो एक पीस मेंउसके बाद तुम जानो और तुम्हारा काम!”

ये कहकर सिद्धू आशू को टंकी से नीचे लेकर आया और अपनी स्प्लेंडर पर आशू को घर छोड़कर अपने घर चला गया!

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शाम का वक़्तयूकेलिप्टिस वाले पार्क में आशू उसी बेंच पर बैठा हुआ हैसामने से सिद्धू धीरे धीरे लंगड़ा कर चलता हुआ  रहा है!

सिद्धूदिखी?

आशूनहीं!

सिद्धूहोठ काहे सूजा है?

आशूचप्पल... बाप!

सिद्धूमम्मी भी?

आशूहम्मपीठ पर दो तीनऔर तुमको?

सिद्धूटांग ही टांग पेलिन हैंऊपर नहीं मारतेकहते हैं चेहरा ख़राब हुआ तो दहेज कम हो जाएगातुम हमारी छोडो.... अब करना क्या है?

आशूघर गए थे उसके... ताला लगा है!

सिद्धूएक बात बताओ तुम उसको देख कैसे लिए इतने अँधेरे मेंहमको तो नहीं दिखी!

आशूदेखे तो नहीं थे ठीक से यारपर लगी तो वही थी!

सिद्धूलगी थी... लगी थी

सिद्धू की आँखें बड़ी और आवाज़ तेज़ होती गई!

अबे सालेतुम्हरे एक ये लगने के चक्कर में इतनी लग गई है हमको और तुमको वो लगी थीतुम गजब बकलोल हो यारपिक्चर चल रही है क्या भूतनी के?आशू कसम से कह रहे हैं जो तुम ये जो सारी नौटंकी फैलाए हो  कसम से तुमहमारा बस चले तो हम ...

तुमको... तुमको... तुमको ...

इतना बोलते हुए सिद्धू दांत पीसते हुएलंगडाते हुए पीछे गया और चप्पल निकाल के पूरी दम से मारी आशू को!

अबे सिद्धू लग जायेगीआशू दोनों हाथ से मुंह बचाते हुए बोला !

सिद्धू ने दूसरी चप्पल निकाल के मारी!

आशू दोनों ही चप्पल से बच गयाउसने सिद्धू कि दोनों चप्पलें उठाई और वापस बेंच पर  गया!

थोड़ी देर बाद दोनों वापस साथ बैठ गए और एक टक उस सड़क को देखने लगे!

सिद्धू ने बड़ी ही ठहरी हुई आवाज में बोला

आशू पता है हमको हमेशा से लगता था कि साला हमारी कहानी के  हीरो भी हम ही है और विलन भीजो हम फैसले लेते है जिंदगी में वही हमें विलन याहीरो बनाते हैं पर तुम्हारी कहानी में  तुम विलन नहीं हो और हीरो... हीरो तो तुम साले किसी के नहीं बन सकतेहमारी जिंदगी के तो बिलकुल भी नहींहमकोलगता है कि ये सड़क है जो भी हैइसका कुछ तो है तुमसेतुमको हम बहुत बचपन से जानते हैं जब भी तुम यहाँ आते हो कुछ अलग हो जाते होतुम्हारा कुछहै इस सड़क सेइन पेड़ों सेये रोड पर पड़ी पत्तियों और यहाँ जमती धुंद सेजब भी हम तुम्हरे घर आकर तुम्हारे बारे में पूछते हैं तुम इसी सड़क पर मिलतेहोपता नहीं क्या मोह है तुमको इस... इस सड़क सेतो बेटा तुम्हारी जिंदगी कि गाड़ी अगर कहीं पहुचेगी  तो इस सड़क से ही होकर पहुचेगीनहीं तो यहीदफ़न हो जाओगे!

आशूहम्म... अबे सिद्धू लेकिन एक बात है गुरु... कल सरस्वती माता सच में बैठ गई बेइक बात बताओ तुम्हारे बाप जिंदा है कि निकल लिएउनका भी तोबोले थे!

सिद्धूअबे निकल क्या लिए... निकले ही समझोरिटायरमेंट है आज... उसी की पार्टी हैरिटायरमेंट के बाद आदमी मरे बराबर ही है!

आशूदेखो बेटा दोनों बात सच हो गईअबे हम ममता कुलकर्णी वाली भी बोल देते तो आज यहाँ हम दोनों के बीच में बैठ के गोल्ड फ्लेक को गांजा बना दीहोती!

ऐसा है आशू तुम्हारी बकचोदी तो ख़तम होगी नहीं... हम निकलते हैंअगर हमारे बाप ने हमको देख लिया तुम्हरे साथहमारी खाल में भूंसा भर देंगे वोहम चलरहे हैं घर में सब मेहमान  रहे हैंहमको बहुत काम है!

सिद्धू उठकर जाने लगा!

आशू- “सिद्धू... चप्पल तो लेते जाओ!”

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अगला दिन सुबह के नौ बजे...

आशू के कमरे के रोशनदान से सूरज की रोशनी अन्दर  रही है ठीक उसके मुंह परदो चार अंगडाई के बाद उसकी आँख खुलती है वो अपना रिलायंस काछोटा वाला फोन उठाता हैएक आँख से देखते हुए लॉक खोलता हैफोन में सिद्धू की इक्कीस मिस्ड कॉल और तीन मैसेज पड़े हैं!

आशू एक आँख से मेसेज पढता है!

पहला मेसेजकॉल बैक करो तुरंत!

दूसरा मैसेजअबे हरामी फोन उठाओ!

तीसरा मेसेज- “वो रूचि ही थी...मेरे घर पर है... पार्टी मेंकल सुबह वापस जा रही हैरिप्लाई करो देखते ही!”

आखिरी मैसेज पढ़ते हीआशू यूं चौका जैसे बिजली का नंगा तार छू लिया होउसने सिद्धू को कॉल बैक कियापूरी रिंग गईफोन नहीं उठाउसने कई बारट्राई किआकॉल नहीं उठावो अपने शॉर्ट्स और बनियान में ही घर से दौड़ते हुए बाहर निकला!

कहाँकहाँ चले?” उसकी मम्मी चिल्लाई!

 रहे हैं बस दो मिनट में!” ये कहकर आशू धाड़ से गेट बंद करके बाहर निकलादेखा तो सिद्धू घर के बाहर सड़क पर चोरों की तरह खड़ा था!

सिद्धू- “अबे आशू कहाँ मर गए थे बे?”

आशू- “कहाँ हैकहाँ है वोतुम साले घर आकर बता नहीं सकते थे!”

सिद्धू- “ हम तो कब से खड़े हैं यहींतुम्हारे बाप साले एक घंटे से पता नहीं क्या आंतें मुंह से बाहर निकाल के मंजन कर रहे हैं हम इन्तेजार कर रहे थे कि वोअन्दर जाये तो हम तुमको जगायेकही हमको देख लेते तो इस बार तो हमारा काम लग जाता!

ऐसा बोलते बोलते सिद्धू ने बाइक स्टार्ट की और आशू पीछे बैठ गया!

अबे आशू ऐसे चलोगे क्याबनियान में?”

आशू- “नहीं ऐसे नहीं... तुम्हारी टी-शर्ट पहनेंगेतुम बनियान पहनोगेरूचि है कहाँ?”

सिद्धू- “उसकी ट्रेन थी सुबह साढ़े नौ कीहमने बातों बातों में पता किया उनके बाप से!”

आशूतो अब

सिद्धूअब क्या... स्टेशन की ओर भगाते हैंजो होगा वहीँ होगा!

वो दोनों स्टेशन कि और तेजी से भागते हैं!

सिद्धू तेज चलाओ यारतेज!”

वो दोनों स्टेशन पहुचते हैंरेलवे घडी में दस बजकर दस मिनट हो रहे हैं!

आशू के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई हैंसिद्धू दौड़ दौड़ कर इन्क्वायरी काउंटर पर दिल्ली वाली ट्रेन के बारे में पता कर रहा हैआशू किनारे सिगरेट पी रहा हैऔर इधर उधर देख रहा है!

सिद्धू- “अरे सरदिल्ली वाली ट्रेन निकल गई क्या?”

इन्क्वायरीदिल्ली की तो चार ट्रेन हैतुमको किस्मे जाना है!

सिद्धू- ‘साढ़े नौ बजे वाली!’

इन्क्वायरी- ‘साढ़े नौ-वो की कोई ट्रेन नहीं हैटाइम सब चेंज हो गया हैएक मालगाड़ी ने पैसेंजर ट्रेन मार दी हैइस रूट की सब ट्रेन का टाइम बदल गया है!गाड़ी का नम्बर बताओ तो बता पायेगे!

"नम्बर...नम्बर तो नहीं हैं!"

सिद्धू और आशू सारे प्लेटफार्म पर घूम-घूम कर रूचि को ढूंढ रहे हैंपर वो कही भी नहींइन्तेजार करते करते एक बज गयाफिर दो और तीन भी!

शाम हो गई...

सिद्धू- ‘आशू हमको लग रहा है वो लोग चले गएघर चलते हैं बेऔर हमें बनियान में बहुत अजीब लग रहा हैबाप के दोस्त कोई देख लेंगे तो फिर पिलाई होजाएगी!’

ऐसा नहीं है कि आशू थक गया था या इन्तेजार करने का दम नहीं था पर कुछ गुस्सा सा था उसका नसीब को लेकरकुछ चिढ थी जिसके चलते उसनेमोटरसाइकिल उठाईटी शर्ट उतारीसिद्धू को दी और बोला बैठोवापस चलते हैं

आशू और सिद्धू ने पूरे रस्ते बात नहीं कीघर करीब  रहा थाआशू वापस जाना नहीं चाहता था ही बात करना चाहता था किसी सेवो सड़क पर रुकाऔर सिद्धू से बोला तुम घर जाओ हम यहीं रुकेंगेसिगरेट जलाई और टहलने लगा!

सिद्धू गया और थोड़ी देर बाद सामने से वही एम्बेसडर झटके लेते हुए  रही थीगाड़ी दस की स्पीड में धीरे धीरे चल रही थीपंचर थी शायदआशू उसीसड़क पर खड़ा थाएम्बेसडर वाले अंकल ने पूछा, ‘अरे भईयापंचर बन जाएगा आस पास कहीं?

आशू की नज़र पीछे वाली सीट पर बैठी रूचि की ओर गई “ उसने उसे देखावो टीशर्ट और लोअर में थीथोड़ी मोटी हो गई थी पर चेहरे पर चमक कमाल थी,इनफैक्ट पहले से भी ज्यादा खूबसूरत दिख रही थीक्लिप दांत में फंसाकर अपने बाल बना रही थीउसने भी आशू को देखाकोरी सीबेस्वाद हंसी दीजिसमेपुरानी पहचान तो थीपर पुरानी बात नहीं!

अरे पंचर बनता है क्या कहींकोई मेकैनिक मिलेगा?” आपसे पूछ रहे हैं!"

आशू ने रूचि को देखुते हुए बोलाथोडा इन्तेजार कीजिये मैं बुला लाता हूँपीछे गली में ही हैआशू ने मेकैनिक बुलवायावो पूरे टाइम वही खड़ा रहापर रूचिने उसे नज़रअंदाज कर दियाबीच में एक दो बार देखा बसआशू बस किसी एक इशारे के इन्तेजार में थापर कुछ नहीं हुआ!

थोड़ी देर बाद उसने देखा रूचि एक कागज़ पर कुछ लिख रही हैउसके दिल में उम्मीद कि किरण जागीगाड़ी का पंचर बन चुका थागाड़ी बढ़ने को थी..आशू कि बेकरारी बढती जा रही थी!

गाड़ी थोड़ी दूर बढ़ीतभी रूचि ने पीछे देखा खिड़की सेअपना हाथ निकाला और एक पर्ची गिरा दीऔर बाय किया

आशू के पूरे शरीर में ख़ुशी कि लहर दौड़ गई!

वो दौड़ा और पर्ची उठाईएक गहरी सांस भरीखुद को संभालाकपकपाते हाथों से पर्ची खोली

पर्ची पर कुछ नहीं लिखा थाउसने पर्ची पलटी 

उस चिमुड़े हुए कागज़ पर पर लिखा था!

सॉरी!”

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एक पुराना सा घरसर्दी का मौसमघास पर ओस की परतें जमा हैदरवाजे पर लगी लोहे कि टीन से पानी चू रहा है... घर की घंटी बजती है तीन बार...

एक छोटा सा बच्चा कनटोप लगाएदांत किटकिटाते हुए बाहर निकलता है

बाहर से आवाज़ आती है “कहाँ हैं बाबा तुम्हारे?”

बच्चे ने कहा “पता नहीं सड़क तक गए होंगेऔर कहाँ जायेंगे!”

ह्म्म्म!’ बूढ़े ने गहरी साँस ली!

उस बूढ़े आदमी ने अपनी छड़ी उठाई और धीरे धीरे ज़मीन टोते हुए सड़क की ओर चला गयादेखा तो दूर कही धुंद में एक आदमी छड़ी की टेक में धीरे धीरेबढ़ रहा हैकभी पेड़ो को देखता हैकभी आसमानकभी सड़कएकदम फुर्सत सेजैसे कि हाल चाल ले रहा हो!

क्या भईयामौसम तो जबर हैहमारी तो नसें जम रही हैंसुनोरम पड़ी है थोड़ी सी हमारे पासबेटाबहू सब गए हैं बाहरएक कटोरी काजू के साथ निपटातेहैं!”

उस बूढ़े आदमी ने उस आदमी के पीछे से जाकर बोला!

अबे सिद्धू पगला गए हो क्यासुगर बढ़ गया है बहुतकल रिपोर्ट आई है!” भारी-थकी आवाज़ में आशू ने बोला!

अमां ले लेते है बे एक-एकअच्छा तुम आधा लेलेना!” सिद्धू ने खांसते हुएहाँफते हुए बोलाऔर यही नोक झोंक चलती जा रही थी सड़क पर गूंजती हुई!

अचानक से कोहरे की एक मोटी परत पड़ी सड़क परजैसे कि पर्दा गिर गया हो एक नाटक काजैसे कि किरदार अभी भी जवान थे बस कहानी बूढी हो गईथी!

वो दो बूढ़े जिनके चेहरों पर झुर्रियां की परतें थीजो जवानी के तमाम किस्से छुपाये हुई थीपैरो में कपकपी जो कच्ची उम्र के पागलपन वाले सैलाब को आजतक महसूस कर रही थी और आँखों में एक अजीब सी चमक जो एक इंतज़ार को आज भी ओढ़े थी उसके बोझ तले दबी नहींउसके पंख लगाए बस उड़ रहीज़िन्दगी के आसमान में ख़ुशी ही ग़म!

और बूढी वो सड़कजिस पर पत्तियों कि डिजाइन आज भी वैसी ही थी जैसी साठ साल पहलेसड़क जो हमेशा जवान थीआशू के लिएसिद्धू के लिए औरउस एक वापस आने वाले के लिएजो वादा करके गया था कि लौटेगाजो शायद बेवफा नहीं था बस ज़िन्दगी की सड़क पर समय के साथ बढ़ गया था!

गीले कोहरे में धीरे धीरे आँखों से ओझल होते हुए वो दोनों बूढ़ेयूं लग रहे थे जैसे दूर आसमान में दो परिंदे एक लम्बी उड़ान के बाद अपने घर को वापस जा रहेहोंजैसे ज़िन्दगी उबासियाँ ले रही हो एक गहरी नींद में जाने से पहले

पत्तियों से छनती ओस की बूँदें गिर रही थी आशू और सिद्धू की झुकी पीठ और गंजे टाट पर...

और कुछ बूंदे गिर रही थी... दो स्कूली बच्चों परजो उसी सडक पर कुछ बीस मीटर पीछे चल रहे थे उन दोनों से!

सड़क के दायीं और बाई ओर

एक दुसरे को देखते हुए...

दुनिया से बेखबरचुपचाप!


~समाप्त

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